*खोखला होता निगम, लुटता टैक्सपेयर: आउटसोर्सिंग की आड़ में कटनी नगर निगम का 'महाखेल'*
स्वीकृत पद दरकिनार: निगम में 835 की जगह पल रही है करीब 1400 की फौज!
शहर के विकास और जनहित के नाम पर बुनी गई एमआईसी की बैठक की चमचमाती कसीदाकारी के पीछे एक ऐसा घिनौना सच छिपा है, जिसे देखकर कटनी की *जनता का खून खौल जाना चाहिए।* "शहर की व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने के लिए मैन पावर बढ़ाना" — यह सुनने में जितना आकर्षक और प्रशासनिक शब्द लगता है, हकीकत में यह कटनी नगर निगम को अंदर से खोखला करने और चंद रसूखदारों की जेबें भरने का एक सुनियोजित 'वित्तीय डकैती' का नया रास्ता है।
इस तथाकथित 'मैन पावर बढ़ाने' के फैसले पर शालीनता का चोला उतारकर यदि सच की परतें खोली जाएं, तो निगम का पूरा ढांचा नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाता नजर आता है:
*1. स्वीकृत पद दरकिनार: निगम में 835 की जगह पल रही है करीब 1400 की फौज!*
प्रशासनिक नियमों का इससे क्रूर मजाक और क्या होगा कि नगर निगम कटनी में कुल स्वीकृत पदों की संख्या मात्र 835 है। लेकिन इसके विपरीत, नियम-कायदों को ताक पर रखते हुए करीब 1400 कर्मचारियों की भारी-भरकम फौज पाल रखी गई है। इसमें से 500 से अधिक कर्मचारी तो सिर्फ और सिर्फ आउटसोर्स के जरिए पिछले दरवाजे से घुसाए गए हैं।
* *टैक्सपेयर्स की जेब पर डकैती:* इन अतिरिक्त और अनावश्यक रखे गए कर्मचारियों के वेतन का बोझ जानते हैं कितना है? हर महीने 5 से 7 करोड़ रुपए!
* यह वह पैसा है जो कटनी का आम नागरिक अपनी मेहनत की कमाई से प्रॉपर्टी टैक्स, जलकर और अन्य करों के रूप में निगम के खजाने में जमा करता है। जनता का यह पैसा शहर की टूटी सड़कों, बजबजाती नालियों और ठप पड़ी स्ट्रीट लाइटों को सुधारने के बजाय, इस अवैध फौज के वेतन के नाम पर सीधे स्वाहा किया जा रहा है।
*2. भाई-भतीजावाद का नाच: अधिकारी, नेता और परमानेंट स्टाफ के 'अपनों' की रेवड़ी*
इस आउटसोर्सिंग भर्ती में पारदर्शिता, योग्यता या मेरिट नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। यह सीधे तौर पर नेताओं, रसूखदार अधिकारियों और खुद निगम के स्थायी (परमानेंट) कर्मचारियों के चहेतों को उपकृत करने की एक 'अवैध मंडी' बन चुकी है। भर्ती की कोई खुली प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती। होता यह है कि किसी सफेदपोश नेता या भ्रष्ट अधिकारी की पर्ची ठेका कंपनी के पास पहुंचती है, और बिना किसी योग्यता के उनके सगे-संबंधियों, चमचों और कार्यकर्ताओं को नौकरी पर रख लिया जाता है।
* *रिश्तेदारों और पड़ोसियों की मौज:* हालत यह है कि आउटसोर्स में नियुक्त कर्मचारियों की सूची उठाकर देख ली जाए, तो उनमें से अधिकांश किसी न किसी बड़े अधिकारी, नेता या निगम के ही परमानेंट बाबू-कर्मचारियों के नात-रिश्तेदार, सगे साले, भतीजे, पड़ोसी और लंगोटिया यार निकलेंगे!
* सरकारी दफ्तर को इन लोगों ने अपनी 'पारिवारिक धर्मशाला' बना दिया है, जहां योग्यता रखने वाले कटनी के आम बेरोजगार युवा दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं, और इन रसूखदारों के निकम्मे रिश्तेदार बिना किसी परीक्षा के सीधे कुर्सियों पर काबिज हो रहे हैं।
*3. 'भूतिया कर्मचारियों' का खेल और ईमानदारी का 'शिकार'*
इस पूरे खेल की सबसे घिनौनी और आक्रामक सच्चाई यह है कि इन आउटसोर्स कर्मचारियों में से लगभग 40% कर्मचारी सिर्फ कागजों पर जिंदा हैं, धरातल पर लापता हैं! ये वो 'भूतिया कर्मचारी' हैं जो कभी निगम का मुंह देखने नहीं आते, लेकिन हर महीने उनके नाम का वेतन बकायदा सरकारी खजाने से निकाल लिया जाता है और इसका एक मोटा हिस्सा ऊपर तक बंटता है।
* *ईमानदार अफसर का शिकार:* दो साल पहले जब तत्कालीन प्रभारी निगमायुक्त शिशिर गेमावत ने इस भ्रष्टाचार की नब्ज पर हाथ रखा और इन कर्मचारियों का 'भौतिक सत्यापन' शुरू करवाया, तो निगम में भूचाल आ गया। आधे से ज्यादा कर्मचारी मौके पर हाजिर होने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाए।
* खेल बेनकाब होने ही वाला था कि कटनी के भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र ने फौरन गिद्ध जैसी मुस्तैदी दिखाई। जांच आगे बढ़कर किसी को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाती, उससे पहले ही इन नेताओं ने अपनी राजनैतिक रसूख का इस्तेमाल कर शिशिर गेमावत जी को प्रभार से ही हटवा दिया! एक ईमानदार अफसर को हटाकर भ्रष्टाचारियों ने यह साफ संदेश दे दिया कि कटनी निगम में लूट का यह धंधा उनकी सरपरस्ती में यूं ही अबाध गति से चलता रहेगा।
*4. कंप्यूटर के ककहरे से महरूम 'बाबू' और नियम-विरुद्ध ऑपरेटरों की ऐश*
तकनीकी और कार्यक्षमता के नाम पर तो निगम में अंधेरगर्दी मची हुई है। आज जब पूरी दुनिया और सरकार डिजिटल इंडिया और पेपरलेस वर्किंग की बात कर रही है, तब कटनी निगम के क्लर्क (बाबू) स्तर के अधिकांश स्थायी कर्मचारियों को कंप्यूटर का बुनियादी ज्ञान तक नहीं है।
नियम यह कहता है कि यदि कर्मचारियों को कंप्यूटर नहीं आता, तो उन्हें अनिवार्य रूप से ट्रेनिंग दी जाए या उनकी जवाबदेही तय की जाए। लेकिन निगम के हुक्मरानों ने भ्रष्टाचार का एक और शार्टकट ढूंढ निकाला।
इन अकर्मण्य बाबूओं को काम सिखाने के बजाय, उनकी सेवा में दो से तीन कंप्यूटर ऑपरेटर नियम-विरुद्ध तरीके से तैनात कर दिए गए हैं। यानी काम एक परमानेंट कर्मचारी का, लेकिन उसे करने के लिए जनता के पैसे पर तीन-तीन आउटसोर्स ऑपरेटर अलग से ऐश कर रहे हैं। यह घोर प्रशासनिक दीवालियेपन और वित्तीय अपराध का जीवंत उदाहरण है।
*वित्तीय संकट के बीच 'मैन पावर' बढ़ाने के नाम पर खेल*
एक तरफ कोर्ट के चक्कर काट रहा निगम अपनी साख बचाने के लिए 10 करोड़ रुपये की राशि जैसे-तैसे जमा करने पर मजबूर हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ इस गंभीर वित्तीय संकट के बीच 'मैन पावर' बढ़ाने के नाम पर गड़बड़झाले का एक और नया रास्ता खोल दिया गया है।
कटनी की जनता को अब जागना होगा और पूछना होगा कि आखिर कब तक उनके टैक्स के पैसों से नेताओं, अफसरों और बाबूओं के रिश्तेदारों, पड़ोसियों और फर्जी कर्मचारियों की यह फौज पाली जाती रहेगी? एमआईसी का यह नया फैसला शहर को सुदृढ़ बनाने के लिए नहीं, बल्कि शिशिर गेमावत जी के जाने के बाद अधूरे छूटे 'नेपोटीज्म और लूट के उस पुराने खेल' को दोगुने उत्साह से दोबारा शुरू करने का एक बेशर्म लाइसेंस है!
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