महापौर को साढ़े तीन साल बाद आई जनसुनवाई की याद, क्या अगले चुनाव की तैयारी शुरू?
कटनी/न्यूज़ एम पी एक्सप्रेस । जनता के साथ जनप्रतिनिधियों का व्यवहार समय के साथ भले ही लोग भूल जाएं, लेकिन चुनावी समय में जनता की याद और उसकी समस्याएं फिर से याद आ जाती हैं। कटनी नगर निगम में महापौर द्वारा जनसुनवाई शुरू किए जाने को लेकर अब इसी तरह के सवाल उठने लगे हैं। सवाल यह है कि महापौर का चुनाव जीतने के करीब साढ़े तीन से चार साल बाद ही क्यों याद आया कि नगर निगम में जनता की समस्याओं को सुनने के लिए नियमित जनसुनवाई की जरूरत है? या फिर इसके पीछे अगले नगर निगम चुनाव की तैयारियों की शुरुआत है, क्योंकि अब कार्यकाल का लगभग एक साल ही शेष रह गया है?
कटनी की जनता के बीच यह चर्चा भी है कि यदि जनसुनवाई के माध्यम से आम लोगों की समस्याएं सुनना और उनका निराकरण करना जरूरी था, तो इसकी शुरुआत कार्यकाल के अंतिम दौर में ही क्यों की जा रही है। जनता को यदि समय पर अपनी समस्याएं रखने का मंच मिलता और उन पर गंभीरता से कार्रवाई होती, तो शायद आज तस्वीर कुछ अलग होती।
वहीं कटनी के महापौर चुनाव को लेकर भी जनता के बीच पुरानी नाराजगी अब तक पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। चुनाव में शहर की जनता ने भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को नकारते हुए निर्दलीय प्रत्याशी पर भरोसा जताया था। लेकिन चुनाव के कुछ समय बाद महापौर के भाजपा में शामिल होने के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए। ऐसे में कई मतदाता आज भी खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं और सवाल करते हैं कि जिस विकल्प पर भरोसा जताकर उन्होंने अपना वोट दिया था, वह बाद में अलग राजनीतिक खेमे का हिस्सा कैसे बन गया?
अब जब कार्यकाल का अंतिम करीब एक साल बचा है और जनसुनवाई की शुरुआत हो रही है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठना लाजिमी है कि यह पहल वास्तव में जनता की समस्याओं के समाधान के लिए है या फिर आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए जनता के बीच अपनी सक्रियता दिखाने की कवायद है।
जनसुनवाई तभी सार्थक मानी जाएगी, जब इसमें केवल आवेदन लेने की औपचारिकता न हो, बल्कि शिकायतों पर समय-सीमा में कार्रवाई भी हो। जनता को अब घोषणाओं से ज्यादा समस्याओं के वास्तविक समाधान का इंतजार है। आने वाला समय बताएगा कि जनसुनवाई नगर निगम की नियमित व्यवस्था बनती है या फिर चुनावी वर्ष की एक और राजनीतिक कवायद बनकर रह जाती है।

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