*जनता के जनादेश से 'राजनीतिक छलावा' और हर मोर्चे पर नाकाम शहर सरकार*


 

*जनता के जनादेश से 'राजनीतिक छलावा' और हर मोर्चे पर नाकाम शहर सरकार*



कटनी /न्यूज़ एम पी एक्सप्रेस :राजनीति में अवसरवादिता और जनादेश के अपमान का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है? कटनी की जनता ने निकाय चुनावों में स्पष्ट संदेश दिया था—उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के दावों को सिरे से खारिज करते हुए निर्दलीय प्रत्याशी प्रीति सूरी पर अपना भरोसा जताया था। जनता का वह मत किसी पार्टी विशेष के लिए नहीं, बल्कि निर्दलीय रहकर शहर के हितों की स्वतंत्र और निष्पक्ष लड़ाई लड़ने के वादे पर मिला था। लेकिन जीत का गुलाल सूखा भी नहीं था कि कुछ ही महीनों के भीतर महापौर प्रीति सूरी उसी भाजपा के पाले में जा बैठीं, जिसे शहरवासियों ने नकार दिया था।  

जनादेश के साथ हुआ यह 'राजनीतिक छल' इस बात का पहला संकेत था कि इस शहर सरकार की प्राथमिकताओं में जनता का विश्वास नहीं, बल्कि सत्ता की मलाई और व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। जनता ने जिस सत्ता पक्ष के खिलाफ वोट दिया था, महापौर का उसी पाले में जाकर बैठ जाना कटनी के मतदाताओं के गाल पर करारा तमाचा था।

*लेकिन सवाल उठता है कि इस 'राजनीतिक घरवापसी' से शहर को क्या मिला? जवाब है—केवल नाकामी, भ्रष्टाचार और बदहाली!*


* *जनादेश से धोखा, कबाड़ और अतिक्रमण को संरक्षण*: निर्दलीय चुनकर आईं महापौर जब सत्ताधारी दल का हिस्सा बन गईं, तो उम्मीद थी कि विकास को रफ्तार मिलेगी। इसके विपरीत, रसूखदारों को संरक्षण मिलना शुरू हो गया। फायर ब्रिगेड की अति-संवेदनशील जमीन पर अवैध कब्जे का खेल में उनका परिवार शामिल है। फिर शहर को अतिक्रमण मुक्त करने की नैतिकता ही नहीं बचती। जब तत्कालीन कलेक्टर ने कबाड़ दुकानदारो को शहर से बाहर करने कार्रवाई का डंडा चलाया, तो जनता की नुमाइंदगी करने के बजाय महापौर ही कबाड़ कारोबारियों की 'सुरक्षा ढाल' बनकर खड़ी हो गईं। एक महीने के मोहलत का बहाना बनाकर उस कार्रवाई को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जो आज तक जस की तस है।


* *गड्डों की भरमार और धूल का गुबार- कायाकल्प का कड़वा सच:* पाला बदलते ही शहर में ठेकेदारी और कमीशन का खेल चरम पर पहुंच गया। सड़कों की मरम्मत के नाम पर सत्ता पक्ष के करीबी नेताओं और चहेते ठेकेदारों को रेवड़ियां बांटी गईं। जनता के टैक्स के पैसों से सड़कें तो नहीं सुधरीं, लेकिन रसूखदारों के बैंक खाते जरूर लबालब हो गए। घटिया निर्माण का आलम यह है कि पूरी सड़क गड्ढों में तब्दील हो चुकी है—बारिश में ये गड्ढे जलभराव के साथ जानलेवा 'स्विमिंग पूल' बन जाते हैं, और धूप निकलते ही पूरा शहर उड़ती धूल के आगोश में समा जाता है। कटनी की जनता आज हर सांस के साथ नेताओं के इस भ्रष्टाचार की धूल फांकने को मजबूर है।


* *स्मार्ट सिटी का झुनझुना और ध्वस्त व्यवस्थाएं:* न तो बेतरतीब ट्रैफिक से राहत के लिए कोई पार्किंग व्यवस्था बनी और न ही ट्रांसपोर्ट नगर की जमीन होने के बाद भारी वाहनों का शहर में प्रवेश रुक सका। सार्वजनिक परिवहन (सिटी बस सेवा) वेंटिलेटर पर चली गई और सीवर लाइन, एसटीपी, रिवर फ्रंट जैसे बड़े प्रोजेक्ट 'टाइम एक्सटेंशन' के खेल में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए।


* *गरीबों के हक पर डाका*: हद तो तब हो गई जब पीएम आवास योजना के तहत झिंझरी में गरीबों के लिए बने आशियानों का निजीकरण कर दिया गया। जिस योजना की नींव जरूरतमंदों के लिए रखी गई थी, उसे पैसों के दम पर बेचने का जरिया बना दिया गया।


*केवल राजनीतिक विश्वासघात*

कटनी की जनता ने जिस निष्पक्षता और बदलाव की उम्मीद में निर्दलीय प्रत्याशी को चुनकर 'शहर सरकार' की कमान सौंपी थी, उसके साथ न केवल राजनीतिक विश्वासघात हुआ, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी शहर को गर्त में धकेल दिया गया। चार साल बीत जाने के बाद आज कटनी नगर निगम के पास अपनी एक भी ऐसी उपलब्धि नहीं है जिसे वह फक्र से बता सके। यह शहर सरकार हर मोर्चे पर, हर कदम पर और हर वादे पर पूरी तरह विफल और दिशाहीन साबित हुई है।

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