पोस्टमार्टम के इंतजार में चार घंटे: रीठी CHC में सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर

*पोस्टमार्टम के इंतजार में चार घंटे: रीठी CHC में सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर*

कटनी/न्यूज़ एम पी एक्सप्रेस /आशीष चौधरी


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जिले के रीठी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की तस्वीर एक बार फिर सवालों के घेरे में है—जहाँ जीवन तो दूर, मृत्यु के बाद भी सम्मान नसीब नहीं हो रहा। एक 70 वर्षीय बुजुर्ग, जिसकी सड़क हादसे में दर्दनाक मौत हुई, उसके परिजनों को अंतिम संस्कार से पहले ‘सिस्टम’ के दरवाजे पर घंटों दस्तक देनी पड़ी, लेकिन भीतर से कोई जवाब नहीं मिला।

सुबह करीब 10 बजे हादसे के बाद शव अस्पताल लाया गया था। उम्मीद थी कि पोस्टमार्टम की प्रक्रिया जल्द पूरी होगी, ताकि परिजन अपने बुजुर्ग को सम्मानपूर्वक विदा कर सकें। लेकिन यह उम्मीद धीरे-धीरे इंतजार और फिर बेबसी में बदलती चली गई। समय गुजरता रहा—घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती रहीं, लेकिन जिम्मेदार डॉक्टर की कुर्सी खाली ही रही।

अस्पताल के गलियारों में उस दिन एक अजीब सन्नाटा था—जहाँ शोक से भरे परिजन कभी हाथ जोड़कर गुहार लगाते नजर आए, तो कभी इधर-उधर डॉक्टर की तलाश में भटकते रहे। चार घंटे तक न तो कोई संवेदनशीलता दिखी और न ही कोई जिम्मेदारी निभाई गई।

हैरानी की बात यह रही कि इस पूरे घटनाक्रम में ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मी भी खुद को असहाय महसूस करते दिखे। कानूनन प्रक्रिया पूरी कराने की जिम्मेदारी निभा रहे ये कर्मचारी भी अस्पताल प्रबंधन के सामने बेबस नजर आए, लेकिन कहीं से कोई सहयोग नहीं मिला।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। रीठी CHC में लापरवाही अब ‘रूटीन’ बन चुकी है। डॉक्टरों का समय पर न आना, मरीजों और परिजनों के प्रति उदासीन रवैया, और खासकर पोस्टमार्टम जैसे गंभीर मामलों में देरी—यह सब अब आम बात हो गई है।

यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—
क्या सरकारी अस्पतालों में ड्यूटी अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है?
क्या एक मृत व्यक्ति को समय पर सम्मान देना भी अब सिस्टम की प्राथमिकता में नहीं है?
और सबसे अहम—क्या जिम्मेदारों पर कभी ऐसी कार्रवाई होगी, जो दूसरों के लिए नजीर बन सके?

रीठी अस्पताल की यह तस्वीर सिर्फ एक लापरवाही नहीं, बल्कि उस संवेदनहीन व्यवस्था का आईना है, जहाँ इंसानियत अक्सर फाइलों के नीचे दबकर रह जाती है।

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